जीव वर्ग

यह जिला अनंत काल से कई जीवधारियों का निवास स्थान रहा है । जिसमे कई विविधता वाले स्तनधारी, पक्षी , सरीसृप तथा मछली सम्मिलित है । बन्दर , लंगूर, जंगली बिल्ली , सूअर , लोमड़ी तथा कुत्तों के अतिरिक्त यह जिला काले भालुनों के लिए भी विख्यात है जो की टिहरी के कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं तथा भूरे एवं सफ़ेद भालू अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं । तेन्दुये लगभग पुरे जिले में पाए जाते हैं । उड़ने वाली गिलहरी जो की “ रिनोला” के नाम से प्रसिद्ध है, यमुना के वन क्षेत्र में पाई जाती है । बाघ तथा हाथी जिले के तराई क्षेत्र जैसे ऋषिकेश/ मुनिकीरेती क्षेत्र में पाए जाते हैं ।
स्तनधारियों में मुख्य रूप से मांसाहारी जो की यहाँ पाए जाते हैं वह हिम तेंदुआ या तेंदुआ है जो की जनपद के उच्च बर्फीले क्षेत्रों में पाए जाते हैं । हिम तेंदुआ एक दुर्लभ प्रजाति है जिसका मुख्य शिकार चट्टानी इलाकों में धार, भरल , भेड़ तथा बकरी होते हैं । काले भालू मुख्य रूप से बांज के जंगलों निवास करते हैं । इनका हमला अकारण और अचानक हो सकता है तथा यह प्राय बांज की जड़ों, बलून के फल, अनाज, फलों तथा पेड़ की छाल खा कर जीवित रहते हैं तथा शायद ही ये कभी किसी को मांस के लिए मारते हों ।
पालतू जानवरों के अलावा यहाँ अन्य जानवर यथा भरल (हिमालयन नीली भेड़), हिमालयन धार ,गोरल, कस्तूरी मृग तथा सांभर पाए जाते है । हिमालयन नीली भेड़ या भरल मुख्यतया 4270 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं तथा कभी कभी गर्मियों के समय 3000 मीटर पर भी देखे जा सकते हैं । सर्दियों में यह काफी नीचे करीब 1800 मीटर तक आ जाते हैं । यह गहरे भूरे रंग या कुछ काले रंग के होते हैं। बुढा नर ज्यादा गहरे रंग का होता है । गोरल जो की बकरी की तरह दिखने वाला जीव है फीके भूरे रंग का होता है जो की गर्मियों में धूसर रंग में परिवर्तित हो जाता है । यह चट्टानी पहाड़ियों पर लगभग 1200 मीटर से 2500 मीटर के बीच जंगलों में पाया जाता है । यह सामान्यता 2 से 6 तक के समूह में रहता है । कस्तूरी मृग जो कि अपनी कस्तूरी फली के लिए विख्यात है , आम तौर पर 2700 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है । मादा मृग में कस्तूरी नहीं पाई जाती है । कस्तूरी मृग एक समय में दो बच्चों को जन्म देती है तथा या काफी अजीब है कि उन्हें कभी साथ में नहीं रखती । दोनों बच्चे सींग रहित होते हैं । बीते कई वर्षों से कस्तूरी मृग विलुप्ति की कगार पर हैं । आयुर्वेद में इनकी कस्तूरी के कई उपचारात्मक महत्व है तथा इसका सुगन्धित इत्र बनाने में भी काफी उपयोग किया जाता है।

सांभर लगभग 2700 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है तथा यह नमी वाले घने जंगलों में रहना पसंद करता है । छोटे बच्चे धूसर भूरे रंग के होते हैं किन्तु व्यस्क नर गहरे रंग के होते हैं । स्थानीय भाषा में इन्हें “जराऊ” कहते हैं । यह कहा जाता है की यह अपने सींग मई के महीने में छोड़ देता है तथा अक्टूबर के महीने में पुन उगा लेता है । बन्दर 2150 मीटर की ऊंचाई से ऊपर नहीं पाए जाते हैं किन्तु लंगूर बहुत ऊंचाई तक भी पाए जा सकते हैं । जंगली कुत्ते यहाँ 1800 से 2200 मीटर की ऊंचाई के बीच पाए जाते हैं । हिरन, सांभर इनका पसंदीदा भोजन हैं । यह पांच से दस के समूह में रहते हैं ।
हाथी कभी कभी भागीरथी एवं यमुना के बीच पाए जाने वाले जंगलों में पाया जाता है । यह जंगलों से सटे खेतों में फसल को बहुत नुक्सान पहुंचाता है।

चीतल झुंडों में ऋषिकेश के जंगलों व देवप्रयाग के जंगलों में देखा जा सकता है । काखड एक भौंकने वाला हिरन है जो झुण्ड में रहने से बचता है एवं सघन वनों में रहता है।

पक्षी

यह जिला पक्षी पशु वर्ग से संपन्न है विशेष रूप से अनेक प्रकार के तीतर, चकोर , फाख्ता , कबूतर जो कि प्रमुख रूप से खेल या शिकार के लिए उपयोग होते हैं । पक्षी के जीवन में ऊंचाई के अनुसार क्षेत्रीय वितरण होता है। जिले में पाए जाने वाले तीतर की मुख्य प्रजाति कलीज, चीड, कोकला तथा मोनाल है । कलीज एक आम पक्षी है जो कि 2600 मीटर से नीचे भारी जंगलों में रहना पसंद करते हैं । बेशकीमती मोनाल आमतौर पर 2700 मीटर से अधिक ऊंचाई पर पाए जाते हैं तथा शीतकाल में देवदार के वनों में नीचे की तरफ आ जाते हैं, जंगली चिड़ियाँ, गौर्र्या , घूघती, सेंतुला, हरीयाल, तोता, चटक, पपीहा, हल्दू, नीलकंठ, कबूतर ओ तीतर विविध रंगों में काफी मात्रा में पाए जाते हैं।

तीतर की प्रजातियों में सामान्य प्रजाति है :- काला तीतर, चकोर व नैयुरा, काला तीतर 2130 मीटर की ऊंचाई के ऊपर पाया जाता है तथा अक्सर घास व झाड़ियों के पास खेत के मैदानों में भी पाया जाता है| चकोर बंजर व झाड़ियों व घांस के हरे भरे खुले पहाड़ी ढाल वाली जगहों पर रहना पसंद करता है तथा 1300 मीटर व 3600 मीटर के बीच की ऊंचाई पर पाया जाता है| यह नियमित रूप से खेत के मैदानों में अनाज के दाने व अनाज की कोमल टहनियों की खोज में आते हैं तथा 6 से 20 के झुण्ड में रहते हैं परन्तु गर्मियों की जगह यह जाड़ों में पायें जाते हैं | नैयुरा या पहाड़ी तीतर जो की सदाबहार वन के निवासी है| यह 1300 तथा 2700 मीटर की ऊंचाई पर पाएं जाते हैं तथा चौड़ी पत्ती वाले वनों में रहना पसंद करते हैं, इस जिले में पाए जाने वाले कबूतरों की प्रजाति में हरीयाल या कील के आकार वाली पूँछ वाले हर कबूतर, माल्यो या नीले चट्टानी कबूतर तथा बर्फीले कबूतर हरीयाल अधिकांश रूप से बांज के जंगलों में झुण्ड में पाया जाता है, यह मुख्य रूप से फूल खाने वाला पक्षी है, इसका रंग पीले हरे रंग का होता है तथा पीछे की और बीच में इस पर लाल रंग के निशान बने होते हैं| माल्यो स्लेटी धूसर रंग के साथ चमकदार धातु व बैंगनी रंग वाली गोल गरदन वाला होता है तथा सर पूरी तरह इस्पात नीला रंग का होता है| भोजन की खोज में इनके झुण्ड दूर दूर तक खेत के मैदानों में विचरण करते हैं| बड़े बड़े सफेद माल्यो या बर्फीले कबूतर बहुत सुन्दर होते है इनका शरीर निचली तरफ से सफ़ेद, काली गर्दन, सफ़ेद क्रॉस पट्टी पूँछ पर तथा ३ सफ़ेद पट्टियां ग्रे पंखो पर होती है तथा अधिक ऊंचाई पर नीले चट्टानी कबूतर को हटा अपना स्थान बनाया है| फाख्तों की प्रजाति में कई अधिक संख्या में घुघूती, या रुफौस टर्टल कबूतर और फाख्ता या चक्राकार फाख्ता सम्मिलित हैं| घुघूती जो की एक काफी बड़ी जाती का पक्षी है| यह पक्षी 3000 मीटर की ऊंचाई से भी ऊपर पाया जाता है| यह घने जंगलों में रहना पसंद करता हैव प्राय जोड़ों व झुण्ड में देखें जा सकते है, फाख्ता भी एक बड़े आकार का पक्षी है जो की 2700 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है तथा सामन्यतः जंगलों में बने घरो व बंगलो के आसपास दिखाई देते है|

श्याम कर्क (wood cock) भी एक प्रकार का शिकार करने योग्य पक्षी है जो कि नमी वाले प्राथमिक वनों में निवास करता है तथा रात्रिचर प्रकृति का होता है| यह अतिकाय शिकारी के समान दिखता है तथा भद्दे ग्रे व भूरे चिन्ह्नो वाला होता है, अन्य पक्षियों की अपेक्षा इसकी आँखेंसर से काफी दूरी पर स्थित होती है| यह सर्दियों में तुलनात्मक रूप से अधिक गर्म स्थानों पर पलायन करता है| शिकार न किये जाने वाले पक्षी जो इस जिले में पाये जाते है इस प्रकार है:- मैगपाई, जेस,थाराशेस बैब्लेस, हंसने वाले थाराशेस तथा कत्फोत्वा आदी| यह समान्य रूप से यमुना के विभाजन पर पाएं जाते है| पक्षी जो की जल के किनारों पर पाए जाते हैं वह है भूरा डीपर पक्षी, स्पॉटेड फोर्कटेल, वाइट कैप्ड रेड्स्टार्ट तथा अनेक प्रकार के वैगटेल, मुर्गाबीस व टिल्स भी भिलंगना में पाए जाते है|

जिले में अन्य प्रकार के पक्षी जैसे पैराडाइस फ्लाई क्रिचर, द ग्रेट हिमालयन बरबैट, द ग्रूसबीक, द पैरिकोट, द गोल्डन ओरीआउल, द हेडस स्पैरो, द सन बर्ड, द फ्लावर पैकर्स, मोर, कोयल, तथा मिनीवेट पाए जाते है| शिकार करने वाले पक्षियों में गिद्ध, फालकन, औकाओ, बासा, शिकरा, धनिया, माछमार मिलते हैं| कई संख्या में फ्लाई किरीचर, द वार्बलर बुलबुल तथा मैना के अतिरिक्त कई स्विफ्ट्स, स्काईलार्क, बुश चाट्स, शैल्लो तथा बंटिंग भी ऐसे पक्षी है जो की इस जिले की धनि पक्षी वर्ग संपदा में सम्मिलित हो इसकी सुन्दरता को बढावा देते हैं| इस बीच जिले के पशु धन में ध्यान देने योग्य पशु है – कस्तूरी मिरग (केवल नर) जिससे की हमे मूल्यवान तथा प्रसिद्ध कस्तूरी प्राप्त होती है तथा बराड़ व सफ़ेद तृतरियाल हिरन की प्रजाति जिसकी मुलायम तव्चा व पूँछ से हमे मफलर व टोपी प्राप्त होती है|

जिले के पक्षी वर्ग धन के अंतर्गत आने वाले पक्षी मोनाल से हमें मूल्यवान तथा सुन्दर पंख प्राप्त होते है जिनका उपयोग कई वाणिज्यिक कार्यों में किया जाता है|

सरीसृप

इस जिले में सांप बहुत अधिक मात्रा में नहीं पाए जाते किन्तु कोबरा एवं रसल्स वाईपर सामान्यता 1800 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं । केवल एक प्रकार का पहाड़ी सांप एनसिस्त्रोडॉन हिमाल्यनस 2400 मीटर की ऊंचाई से ऊपर पाया जाता है । यह एक जहरीला सांप है यधपि इसका काटना घातक नहीं होता । बिना जहर वाले साँपों में पाईथन प्रमुख है इसकी लम्बाई 9 मीटर तक होती है हालाँकि 6 मीटर से अधिक लम्बाई का सांप दुर्लभ होता है।

रेड स्नेक जो की 3 मीटर लम्बा होता है, भी इस जिले में देखा गया है।

जौंक विशेष रूप से बरसात के मौसम में सक्रिय होती है और यह औंक के वनों में रहना पसंद करती है।

मेढ़क तथा भेक – यह दोनों ही उभयचर हैं तथा जिले में लगभग सभी जगह पाए जाते हैं।

छिपकली की कई प्रजातियों को चट्टानों पर धुप सेंकते हुए देखा जा सकता है । रक्त चूसने वाली छिपकली अपने इस नाम के बावजूद पूरी तरह से हानिरहित है तथा 25 सेंटी मीटर से 40 सेंटी मीटर की लम्बाई वाली हो सकती हैं।

मछली

मछलियाँ लगभग सभी नदियों, धाराओं एवं झीलों में पाई जाती हैं । टिहरी झील, जलकुर, अलगाड, भिलंगना , भागीरथी तथा अलकनंदा में प्रचुर मात्रा में बड़ी मछलियाँ पाई जाती हैं । इनमे से कुछ गिध्ही, ग्युनरी, धुनला मछलियाँ हैं जो एक से तीन किलो वजन की होती हैं जबकि बड़ा खसरा का वजन लगभग 10 कि0 तक होता है।