वनस्पति

इस जनपद में हिमालयी वनस्पतियों की विशाल श्रृंखला पायी जाती है। उष्ण कटिबंधीय प्रजातियों से भिन्न, यह निचली पहाड़ियों के बाह्य क्षेत्र से उत्तर में अल्पाइन फूलों तक फैली है। क्योंकि जनपद का अधिकांश भू-भाग जंगल है, अतः हम कह सकते हैं कि अधिकांशतः यहाँ की वनस्पति जंगलों में उपलब्ध है।|

इस जनपद में चीड़, बांज, साल, देवदार, हल्दू, सरू, बुरांस, भोजपत्र, अखरोट,गूलर, आल्डर, तथा कई प्रकार के फलों के पेड़ जैसे अंजीर, काफल, शहतूत, किंगोड, रसभरी, चेरी, खुबानी,बेर,आडू,संतरा, नींबू, केला, अनार, तथा अखरोट पाए जाते हैं | इसके अतिरिक्त कई प्रकार के औषधीय पौधे, झाड़ियाँ एवं घास भी पाए जाती हैं |

इस जनपद की वनस्पति को मुख्यतया 6 प्रकार रूप से विभाजित किया जा सकता है |

  • उष्ण कटिबंधीय सूखा पर्णपाती वन
  • साल वन
  • चीड़ वन
  • देवदार वन, फर वन
  • ओंक वन
  • अल्पाइन चारागाह

उष्ण कटिबंधीय सूखा पर्णपाती वन:-

यह वन मुख्यतः यमुना तथा अलगाड नदियों के संगम के आसपास तथा इनकी तलहटी में पाए जाते हैं | इनका विस्तार 1200 मीटर की ऊंचाई तक होता है | यहाँ सर्वाधिक मात्रा में पाए जाने वाली प्रजाति में कुरी, केमेला, जिंगान, मंदार, धौला, बिंदा, बन्सिंगा, तथा गन्देला है|

साल वन:-

यह वन लगभग 1066 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं | इन वनों का सबसे ज्यादा विकास देवप्रयाग तहसील की चन्दन घाटी में तथा टिहरी तहसील की बण्डल घाटी में हुआ है | साल के छोटे इलाके भी पाए जाते हैं जो कि मुनिकीरेती तथा शिवपुरी के आसपास पाए जाते हैं | साल अत्यधिक झुण्ड में उगने वाले वृक्ष हैं | अत्यधिक शुष्क स्थानों पर शुष्क पोधों की प्रजातियों का विकास होता है, इन प्रजातियों का विस्तार हिमालय की श्रृखलाओं के बाहर नहीं होता किन्तु फिर भी टिहरी जनपद के उत्तरी भाग के मुख्य नदी घाटी में यह प्रजातियाँ पाई जाती हैं | यह मुख्य रूप दक्षिणी ओर से 762 मीटर की ऊंचाई पर तथा 1066 मीटर उत्तर की ओर फैले हुए हैं और कई प्रकार के पेड़ इन वनों में पाए जाते हैं जैसे सैन, बकली, जिंगान, हल्दू, काजू, संधान, रोहिणी और अमलतास | बकली का उपयोग लकड़ी का कोयला बनाने के लिए एवं संधान की लकड़ी का उपयोग कृषि के औजार बनाने के लिए होता है | खैर के वृक्ष भी इन वनों में पाए जाते हैं | इन वनों में घास भी प्रचुर मात्रा में पाई जाती है ज्यादातर साल के वनों में 80 से 90 प्रतिशत तक प्रमुख वृक्ष प्रजाति है जिनकी प्रवृति घने पेड़ों की होती है | साल वनों में विविध प्रजातियों का प्रतिशत अधिक होता है|

चीड़ के वन:-

चीड के वन आमतौर पर दक्षिण की ओर 1000 मी से 2150 मी तक तथा उत्तर की तरफ 900 मी से 2000 मी तक पूरे जिले मे फैले हुए हैं , इन वनों का सबसे अच्छा विकास भिलंगना घाटी व इसकी सहायक घाटियाँ, अलकनंदा व मन्दाकिनी के आस पास देखने को मिलता है , चीड़ लगभग सभी भौगोलिक परिवेश मे पाया जाता है,यद्यपि किन्ही दक्षिणी ढलानो पर चूना पत्थर वाली काली मिटटी काफी खुश्क होती है जिस वजह से चीड़ यहाँ उग पाने मे असमर्थ है| फिर भी चीड के वन स्वयं को दक्षिण के इलांको मे स्थापित कर पायें जहाँ मरुदभिद वातावरण तथा आगजनी की प्रबलता अधिक है| कुछ अन्य पेड़ व झाड़ियों की प्रजाति भी यहाँ जीवित रहती है , सभी चीड़ के वनों मे पाइन प्रजाति के वृक्षों का आधिपत्य है , यदि उत्तरी क्षेत्र की तरफ देखा जाये तो यहाँ की मृदा मे काफी मात्रा मे नमी मौजूद है तथा यहाँ आगजनी से होने वाले नुकसान भी कम होते है, कुछ अन्य वृक्षों की प्रजाति भी यहाँ पाई जाती है | चीड़ के वन कदाचित ही घने होते है , इन वनों की जमीन घास से ढकी होती है जो कभी कभी घनी भी होती है तथा यहाँ झाड़ियों के असतंत वन भी मौजूद है जो कि अक्सर कम दुरी के बावजूद व्यापक रूप से फैले है तथा अपनी उपस्थित दर्ज कराते है|इन वनों की खुली प्रकृति, अन्य वृक्ष प्रजातियों की कमी आगजनी को बढावा देती हैं | इन वनों की निचली सीमाओं मे चीड़ के वृक्ष विविध जाति के वृक्षों के साथ घुल मिल गए हैं, कुछ समय मे साल के वनों मे भी यह मिश्रित हो गए हैं | चीड़ गोंद व इसकी लकड़ी की इमारत बनाने के लिए उपयोग होती है | इसके बीज का तेल निकालने मे उपयोग होते है व इसके बीज भून कर खाने योग्य हो जाते है | इसकी सुखी पत्तियां खाद क लिए उपयोग होती है |

देवदार के वन :-

यह वन प्रताप नगर तहसील के उत्तरी भाग, घनसाली एवं धनोल्टी मे चीड़ व सरू के वृक्षों के साथ समुद्र तल से लगभग 1520 तथा 2150 मी की उचाई पर पाए जाते है | यह वन खुले होते है व वृक्ष अधिक लम्बे नहीं होते, देवदार की लकड़ी सभी शंकुधारी वृक्षों मे अधिक मूल्यवान है जो घर बनाने , इमारते व नाव बनाने तथा अनाज के भंडार व रेलवे स्लीपर बनाने में उपयोग होती है |

फिर तथा स्प्राउस वन :-

यह वन जिले की उतरी भाग में लगभग 2150 मीटर तथा 3050 मीटर की उचाई पर पाए जाते है| जहाँ पर भी सिल्वर फिर की अधिकता हो वहां पर इन वनों का अधिपत्य होता है वह भी केवल तब जब यह स्प्राउस के साथ मिलकर यहाँ पाए जाते है| इन वनों के कुछ भाग खिरसू तथा मोरू के वृक्षों से घिरे रहते है|

ओक के जंगल:-

मुख्य रूप से तीन प्रकार के ओक है बांज , मोरू, खिरसू इनमे से हर किसी का अपना-अपना अलग ऊंचाई का क्षेत्र है | इस जिले में बांज के वन मुख्य रूप से 1800 मीटर से 2150 मीटर (समुद्र तल से) की उंचाई वाले क्षेत्र में पाए जाते है| यह चीड क्षेत्र में नीचे की ओर नमीदार खड्डों वाली जगह में 1050 मीटर तक भी मिलते है|बांज के वह वन अधिक घने होते है दक्षिण में देखा जाये तो जमीन पूरी तरह घास से ढकी रहती है जबकि उत्तर में घास की मात्र काफी कम है| बांज के साथ कई संख्या में झाड़ियाँ भी होती है|

मोरू के वन :-

समुद्र तल से 1980 मीटर तथा 2750 मीटर के बीच की उंचाई में तथा बांज व खिरसू के बीच के मध्यमवर्गीय क्षेत्रो में पाये जाते है | दक्षिण में जहाँ मोरू ने कई मायनो में अपनी जगह बनायीं है, इसका अधिकतम विकास 2125 मीटर से 2450 मीटर की उंचाई तक (नमी वाली मृदा विशेष रूप से जहाँ पर भूमि के नीचे का भाग चूना पत्थर का है) हुआ है| घनत्व तथा नमी के कारण इन जंगलो में आगजली की घटनाएं कम हैं| कुछ अन्य वृक्षों की प्रजातियाँ भी मोरू के साथ अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए प्रतिस्पर्धा करती है| इनमें से सबसे सामान्य प्रजाति देवदार तथा खरसू है| खरसू के वनों ने 2350 मीटर से 3500 मीटर की उंचाई के बीच प्रतापनगर तहसील के उतरी भाग (उत्तर-पूर्वी क्षेत्र को छोडकर) तथा देवप्रयाग का दक्षिण- पूर्वी भाग पर अपना अधिकार किया है|
यह बराबर मात्रा में उत्तर तथा दक्षिण क्षेत्रो में पाए जाते है तथा इनके कुछ सफल प्रतियोगी, ‘सिल्वर फिर’ तथा मोरू के अलावा और भी कई वृक्ष है| फिर के वन खिरसू अधिकृत क्षेत्र के एक छोटे से भाग में पाया जाता है| मोरू वन उतरी क्षेत्र में सफलता के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकता है| निचली सीमओं पर खरसू अक्सर बांज के जंगलो से होकर ही गुजरते है| हालाँकि कुछ उत्तरी क्षेत्रों में यह अक्सर मोरू, स्प्रूस तथा सिल्वर फिर के वृक्ष को भी स्थान देते है| उपरी सीमाओं पर यह विर्च तथा सिल्वर के वनों में होते है जबकि उतरी ढलानों पर कई बार प्रत्यक्ष रूप से घास के मैदानों में है| आदर्श खिर्सू के वन घने होते है| इनके सबसे आम सहयोगी वृक्ष बुरांश वृक्ष है जो कि उतनी ही अधिक मात्रा मे खिर्सू के वनो में है जितने कि बांज के वृक्ष| वनों मे झाड़ियों की काफी विविधता यहाँ पाई जाती है जिनमे सबसे आम तिमला है|

अल्पाइन चारागाह:-

यह जिले के उत्तर पूर्वी भाग में प्रतापनगर, देवप्रयाग तहसीलों में समुद्रतल से 3500 मीटर से 5000 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं| इन क्षेत्रों की भूमि अक्टूबर से मई तक बर्फ से ढकी रहती है किन्तु जून से सितम्बर तक इस क्षेत्र में अत्यधिक मात्रा में अनेक प्रकार की विविधता वाले घास, जड़ी-बूटी, झाड तथा फूल पाए जाते हैं | यह क्षेत्र बहुत ही सुन्दर है तथा विस्तृत चारागाह पशुओं को चरने हेतु उपयोग होता है | उत्तर की और प्रसिद्ध भोजपत्र नामक वृक्ष पाए जाते हैं जिनकी टहनियों से भोजपत्र प्राप्त होता है | कागज़ की खोज होने से पूर्व भोजपत्र का उपयोग पुराने समय में पुस्तकें लिखने हेतु किया जाता था |